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राजकाज

लो जी, गांव बसा नहीं, मुखिया की लड़ाई शुरू

लो जी, गांव बसा नहीं, मुखिया की लड़ाई शुरू

देवेंद्र, यादव जी, आपके बयान ने मेरा मान बढ़ाया। हरीश रावत ही क्यों! प्रत्येक नेता व कार्यकर्ता के बिना 2022 की लड़ाई अधूरी है, पार्टी को बिना लाभ-लपेट के 2022 के चुनावी रण का सेनापति घोषित कर देना चाहिये, पार्टी को यह भी स्पष्ट कर देना चाहिये कि कांग्रेस की विजयी की स्थिति में वही व्यक्ति प्रदेश का मुख्यमंत्री भी होगा।

क्या दल-बदलुओं के लिए 2022 का चुनाव होगा कब्रगाह?

क्या दल-बदलुओं के लिए 2022 का चुनाव होगा कब्रगाह?

हरियाणा की राजनीति आयाराम-गयाराम के लिए बदनाम थी, लेकिन अब उत्तराखंड ने दल-बदल में हरियाणा को पीछे छोड़ दिया है। मिशन 2022 के लिए कांग्रेस तय मान कर चल रही है कि उनकी बारी है इसलिए सरकार भी उनकी आएगी। पिछले चार साल में कांग्रेस ने जनता के लिए चवन्नी का काम भी नहीं किया है और न ही विपक्ष की सही भूमिका अदा की है। प्रदेश कांग्रेस में आज अच्छे नेताओं का टोटा है और उनके पास दो दर्जन चेहरे भी ऐसे नहीं हैं जो अपने दम पर चुनाव जीत सकते हों। लिहाजा अब कांग्रेस की नीति वही है जो 2017 में भाजपा की थी विधायकों की तोड़-फोड़।

कहीं गांगुली तो नहीं बंगाल में भाजपा का चेहरा, राज्‍यपाल से मुलाकात के बात क्‍यास शुरू

कहीं गांगुली तो नहीं बंगाल में भाजपा का चेहरा, राज्‍यपाल से मुलाकात के बात क्‍यास शुरू

कोलकाता, 28 दिसंबर। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्‍यक्ष सौरव गांगुली के पश्‍चिम बंगाल के राज्‍यपाल जगदप धनखड़ के साथ मुलाकात के बाद उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें शुरू हो गई हैं। बताया जा रहा है कि गांगुल रविवार शाम को राज्‍यपाल से मिले हैं। हालांकि उनकी इस मुलाकात को शिष्‍टाचार भेंट कहा जा रहा है, मगर सियासी गलियारों में चर्चायें कुछ ओर हैं।

टेस्ट मैच सीरीज नहीं, विश्व कप जैसा हो 2022 का चुनाव

टेस्ट मैच सीरीज नहीं, विश्व कप जैसा हो 2022 का चुनाव

तीन-चार दिन पहले प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय गया। वहां कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे सलाह दी कि अब मैं कांग्रेस के खिलाफ न लिखूं। मैंने कहा, क्यों? वो बोले, अब हमारी सरकार आने वाली है। मैंने कहा कि क्या उत्तराखंड टेस्ट क्रिकेट सीरीज है कि बारी-बारी से सत्ता सुख भोगो? लेकिन सच तो सच है। पिछले 20 साल से ऐसा ही हो रहा है। कांग्रेस और भाजपा बारी-बारी से प्रदेश की सत्ता में आ रहे हैं और राज्य का बेड़ागर्क कर रहे हैं। हमारे जल, जंगल और जमीनों की लूट हो रही है और पहाड़ की पगडंडी से लेकर शहर की सड़कों पर उतरे राज्य आंदोलनकारी मूक तमाशा देख रहे हैं।

भाजपा को विभिषणों पर भरोसा, तो दीदी भी है झांसी की रानी, देखें विश्‍लेषण

भाजपा को विभिषणों पर भरोसा, तो दीदी भी है झांसी की रानी, देखें विश्‍लेषण

कोलकाता, 20 दिसंबर। पश्‍चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री और देश की फायरब्रांड नेत्री ममता बनर्जी इन दिनों अपनी पार्टी में भाजपा की सेंध से परेशान हैं, मगर वह अब भी हार मानने वाली नहीं हैं। उन्‍होंने पार्टी में शुरू हुई टूट का रोकने के बजाय अपनी ही पार्टी के बागियों के खिलाफ हमलावर रूख अपनाने की रणनीति बनाई है। बताया जा रहा है कि ममता दीदी पार्टी से बगावत करके भाजपा में शामिल हुए अपने सिपहसालारों को उनके घर पर घेरने जा रही हैं। 

लो जी, समर्थकों को बंटने लगी रेवड़ियां, विभाग कब बंटेंगे?

लो जी, समर्थकों को बंटने लगी रेवड़ियां, विभाग कब बंटेंगे?

लोकतंत्र में एक बडी अच्छी परम्परा है, चार साल तक सीएम-पीएम न तो जनता की सुनता है और न ही समर्थकों की। उसे पता होता है कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और उसकी निष्ठा चुटकी भर। सो, चार साल खूब मनमानी की जाती है और पांचवें साल में कुछ काम जनता का और कुछ काम समर्थकों का। समर्थकों के आगे पदों का चारा फेंक दिया जाता है, कि चल कुछ तू भी चुग ले। जनता को बहलाया जाता है कि सुन री नामुराद, घूरे के भी दिन फिरते हैं, तेरे भी फिर रहे हैं, तू भी बड़ा विकास, विकास करती है, गरीबी का रोना रोती है, चल तू भी कर ले एहसास कि विकास क्या होता है?

लो जी, छुटकू ने बड़कू रावत को दे मारा धोबी पछाड दाव

लो जी, छुटकू ने बड़कू रावत को दे मारा धोबी पछाड दाव

गंगा के एस्केप चैनल यानी हरकी पैड़ी को एक धारा मात्र मानने का 2016 का हरदा सरकार का फैसला त्रिवेंद्र रावत ने पलट डाला। यह धारा 1905 में अंग्रेजों ने बनाई थी। सच यही है कि हरकी पैड़ी गंगा का निर्बाध प्रवाह नहीं है। लेकिन बात संत समाज और गंगा सभा की थी। हरिद्वार कुंभ से पहले सरकार किसी भी गतिरोध से बचती, लिहाजा एस्केप चैनल का अध्यादेश निरस्त कर दिया गया।

सत्ता तो हासिल की लेकिन विश्वास नहीं जीता

सत्ता तो हासिल की लेकिन विश्वास नहीं जीता

भारत की राजनीति में दल-बदल के दलदल में धंसे नेताओं को पूर्व सीएम विजय बहुगुणा की स्थिति से सबक लेना चाहिए। सिंहासन का दुरुपयोग और बदले की आग से दल परिवर्तन से भले ही कोई नेता सत्ता में शामिल हो जाए, लेकिन जरूरी नहीं कि वो सत्ताधारी दल का विश्वास भी जीते। उत्तराखंड भाजपा ने विजय बहुगुणा को राज्यसभा का टिकट न देकर साफ संदेश दे दिया है कि दल-बदल और अवसरवादिता को भाजपा की बड़ी ना है।

त्रिवेंद्र चचा, मेरी मानो, मत करो कैबिनेट विस्तार

त्रिवेंद्र चचा, मेरी मानो, मत करो कैबिनेट विस्तार

त्रिवेंद्र सरकार के साढे़ तीन साल बीत चुके हैं। साढ़े सात लाख लोगों को रोजगार मिल चुका है। स्वरोजगार की लाइन लगी है और किसानों की आय दोगुनी हो चुकी है। कोरोना को हम कब का हरा चुके हैं। बाजार में धड़ल्ले से शराब बेची और पी जा रही है। व्यापारी वर्ग खुशहाल हैं। त्योहार में बाजारों में भले ही जेसीबी की धमक हो, लेकिन चमक है। पीरूल से बिजली बनाई जा रही है और भांग की खेती की जा रही है। पर्यटन व्यवसाय को पंख लगे हैं और धनौल्टी-मसूरी में बालीवुड-हालीवुड की शूटिंग हो रही है। उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय गुजरात से अधिक है और बांग्लादेश-नेपाल की तुलना में कम गरीबी है। क्या हुआ कि हम 60 हजार करोड़ कर्ज में डूबे हैं और बाजार से कर्ज उठाकर कर्मचारियों को वेतन दे रहे हैं। उत्तराखंड को गर्व है कि हमें केंद्र के आगे हाथ नहीं पसारने पड़ रहे हैं, बल्कि 2200 करोड़ केंद्र से जीएसटी के लेने हैं।

पहाड़ की पगडंडी से सत्ता की सीढ़ी चढे़ हरक को क्या ले डूबेगी साइकिल?

पहाड़ की पगडंडी से सत्ता की सीढ़ी चढे़ हरक को क्या ले डूबेगी साइकिल?

कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत हमेशा विवादों में रहते हैं, इसके बावजूद उनके प्रति आम जनता में साफ्ट कार्नर होता है। उनके नाम पर सब हंस कर टाल देते हैं। कारण, हरक भले ही विवादों में हों, लेकिन वो अपने समर्थकों और रिश्तेदारों को रोजगार दिलाने में सबसे आगे होते हैं। हरक जबरदस्त जुगाडू हैं। पहाड़ की पगडंडी से चलकर सत्ता की सीढ़ी चढ़े हरक को राजनीति के सभी गुर आते हैं। आज जब उन्हें सरकार ने उत्तराखंड भवन और सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है और उन्हें इसकी भनक भी नहीं लगी तो एक बार फिर उनके लिए राजनीतिक चुनौती बढ़ी है। देखे इससे कैसे निपटते हैं।

भगवान भरोसे चल रही है त्रिवेंद्र सरकार

भगवान भरोसे चल रही है त्रिवेंद्र सरकार

मेरे पास त्रिवेंद्र सरकार के लिए सौ से भी अधिक सवाल हैं, संभवतः जिनका जवाब सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास भी नहीं हो। कोरोना और मंदी के काल में जब प्रदेश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कार्य होने चाहिए थे, तब सरकार अजीबो-गरीब फैसले ले रही है। उपनल के माध्यम से सामान्य लोगों को भी रोजगार देने की बात की जा रही है। सरकार पहले बताए कि रोजगार कहां और किस विभाग में हैं? सीधी सी बात है कि सरकार कम से कम आज इस स्थिति में भी नहीं है कि वो भर्ती कर सके। तो एक स्वतंत्र संस्था जो पूर्व सैनिकों और उनके परिवार के लिए है तो उसे बर्बाद क्यों किया जा रहा है? हरक सिंह रावत ने कांग्रेस शासन काल में ही लाभ में चल रही इस संस्था का भट्टा बिठाने का काम किया और अब रही-सही कसर त्रिवेंद्र सरकार ने कर दी है। 

केंद्रीय कांग्रेस बनाम प्रदेश कांग्रेस मतलब दोनों कांग्रेस मरणासन्न

केंद्रीय कांग्रेस बनाम प्रदेश कांग्रेस मतलब दोनों कांग्रेस मरणासन्न

कांग्रेस की लुटिया धीरे-धीरे डूब रही है। कांग्रेस टाइटेनिक है, इसलिए इसके डूबने में समय लग रहा है। कांग्रेस की बदहाली के लिए कांग्रेस नेता जिम्मेदार हैं। बूढ़े-थके हारे कांग्रेस के नेता अपना बुढ़ापा बचाने के लिए जबरदस्ती सोनिया-सोनिया, राहुल-राहुल राग गा रहा हैं। मैं पहले भी कह चुका हूं कि कांग्रेस के दस में से सात महासचिव 70 साल से अधिक उम्र के हैं। ऐसे में उनकी सोच यही है कि किसी तरह से उनकी कुर्सी बची रहे, कांग्रेस बचे या न बचे। यदि ऐसा नहीं होता तो ये सब इस्तीफा देते और मुकुल वासनिक, जितिन प्रसाद, रणदीप सुरजेवाला, सचिन पायलट, मनीष तिवारी को पार्टी कमान सौंपते। उल्टे जितिन प्रसाद के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जा रही है कि उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने और पार्टी में ऊपर से नीचे तक बदलाव की बात कही। पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने भी यही मांग की है।

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