बिलासपुर चंबा हमीरपुर कांगड़ा किन्नौर कुल्लू लाहौल-स्पीति मंडी शिमला सिरमौर सोलन ऊना
ताज़ा ख़बरें
कोरोनाः 477 संक्रमित, 227 मरीज हुए ठीककोरोनाः बिना मास्क के घूमने वालों के काटे चालानसंगीत की ताकत बताती है एआर रहमान की फिल्म 99 SONGS ; पढ़ें रिव्यू, देखें फिल्मकोरोनाः 10 हारे जिंदगी की जंग, कुंभ से लौटे 8 श्रद्धालुओं समेत 971 नए मामलेकोरोनाः 1 नया मामला आयाIPL 2021: वॉर्नर-जॉनी की शानदार पारी काम नहीं आई, मुंबई से 13 रन से हारा हैदराबादहमीरपुर: 69 लोग निकले कोरोना पाॅजिटिवकांगड़ा: कोरोना से तीन की मौत, 258 नए संक्रमित मिलेसीएम ने कोरोना से लड़ाई में उद्योगपतियों का सहयोग मांगाभाषा, शास्त्री व कला अध्यापक के लिए भूतपूर्व सैनिक आश्रित करें आवेदनशुद्ध हवा और जल की उपलब्धता में वन संपदा महत्वपूर्ण: डीसी चंबाराज्यपाल ने कोविड वैक्सीन की दूसरी खुराक ली अप्रेंटिस के 100 पदों पर भर्ती करें आवेदनपंचायतों में जल संग्रहण तालाब बनाने को विभाग तैयार करे योजना:डीसीहोम आईसोलेट मरीजों की स्वास्थ्य मापदंडानुसार नियमित निगरानी हो: सीएमशाहपुर में किया जाएगा इंडोर स्टेडियम का निर्माण:सरवीण चौधरी
संपादकीय

राजनीति में तय हो नेताओं की रिटायरमेंट की उम्र

January 10, 2021 12:39 AM
राजनीति में तय हो नेताओं की रिटायरमेंट की उम्र

- दलों और जनता पर बोझ बन जाते हैं ये बुजुर्ग नेता
- सम्मानजनक तरीके से नेता लें विदाई, न हो फजीहत
उत्तराखंड के दो दिग्गज नेता जनरल बीसी खंडूड़ी और जनरल टीपीएस रावत का राजनीतिक हश्र क्या हुआ? विधायक हरबंस कपूर को भाजपाई क्यों कोसते हैं? हरदा की नौटंकियों के बावजूद उन्हें पार्टी में सम्मान क्यों नहीं मिल रहा? इंदिरा हृदयेश की जग हंसाई क्यों हो रही है? राज्य आंदोलन के सूत्रधार दिवाकर भट्ट के खिलाफ यूकेडी में ही विरोध क्यों है? भाजपा अध्यक्ष बंशीधर भगत अपनी पार्टी के जिलाध्यक्ष को भी क्यों नहीं पहचान पाते हैं? पूर्व सीएम विजय बहुगुणा को एक छोटी सी कार्यकर्ता भरे मंच से बेइज्जत कर देती है लेकिन वो फिर भी राजनीति में डटे हुए हैं।

यदि हम गंभीरता से आकलन करें तो इस सबका कारण है इन नेताओं की उम्र। भारत के महान बल्लेबाज धोनी को एहसास हो गया था कि अब क्रिकेट में बने रहना उनके लिए संभव नहीं है तो उन्होंने संन्यास ले लिया। लेकिन एक भी नेता ऐसा नहीं है कि जिसने राजनीति से संन्यास लिया हो। राज्यपाल बनने को राजनीतिक रिटायरमेंट कहा जाता है लेकिन कई उदाहरण हैं कि राज्यपाल बनने के बावजूद नेता फिर सक्रिय राजनीति में आ गये।

उत्तराखंड के सभी पार्टियों के बुजुर्ग नेता जनता और दूसरी पीढ़ी के नेताओं की गले की फांस बने हुए हैं। हरदा, हरबंस, दिवाकर, इंदिरा कोई भी रिटायर नहीं होना चाहता है न ही दूसरे को आगे बढ़ने देना चाहता है। ये नेता सोचते हैं कि जनता उनकी जागीर है। यदि वो नहीं तो उनके बच्चों को ये राजनीतिक विरासत मिलनी चाहिए। बस, यही सोच कर रिटायर नहीं हो रहे। जनरल टीपीएस रावत इस राजनीतिक विरासत के अपवाद हैं। वो अपने किसी भी रिश्तेदार को राजनीति में लेकर नहीं आये। बाकी सब अपने बच्चों या परिजनों को राजनीति में स्थापित करने में जुटे हुए हैं। हालांकि ये घाध नेता जानते हैं कि इनके बच्चे जब राजनीति में 40-50 साल की उम्र में भी स्थापित नहीं हो सके तो अब क्या होंगे? लेकिन सब जुटे हुए हैं।

अब समय आ गया है कि जनता को जागरूक होना चाहिए। यह लोकतंत्र है किसी की जागीर नहीं। इन नेताओं को राजनीति से रिटायर होना ही होगा; यदि उम्र तय नहीं होती तो जनता को तय करना होगा कि 70 प्लस किसी भी नेता को चुनाव न जीतने दिया जाए। इसके बाद ही राजनीतिक दल मजबूर होंगे कि वो बुजुर्गों को सलाहकार या राज्यपाल के रूप में ही स्थापित करें।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

Related Articles
कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें
और संपादकीय ख़बरें
लोकप्रिय ख़बरें
News/Articles Photos Videos Archive Send News

Himachal News

Email : editor@firlive.com
Visitor's Count : 1,23,82838
Copyright © 2016 First Information Reporting Media Group All rights reserved.
Website Designed by Mozart Infotech