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क्या हमने उत्तराखंड अविनाश आंनद और भजन सिंह के लिए बनाया?

January 12, 2021 10:49 PM
क्या हमने उत्तराखंड अविनाश आंनद और भजन सिंह के लिए बनाया?

- राज्य आंदोलनकारी दर-दर की ठोकरें खा रहे, भ्रष्ट अफसर-नेता मलाई
- ओ पहाड़ियो, कब तक चुप रहोगे? अपनी नस्ल समाप्त होने तक?

दिसम्बर 2019 में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मीडिया को बताया था कि आस्टेªलिया से 240 मेरिनो भेड़ लाई गयी हैं। इन भेड़ों में 200 फीमेल और 40 मेल थीं। कापड़ीधार में इनको रखा गया है। इनको भारत लाने में 8.5 करोड रुपये का खर्च आया। उद्देश्य था कि ऊन का व्यवसाय बढ़ेगा, किसानों की आय और भेडों की नस्ल भी सुधरेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के पत्र से अब पता चल रहा है कि अधिकांश भेड़ों में प्रजनन की क्षमता ही नहीं है। शीप एडं वूल डिवलेपमेंट बोर्ड भेड़ों के व्यवसाय को बढ़ाने की जगह मीट बेचने लगा।

इस बोर्ड के सीईओ अविनाश आनंद पर नोएडा में प्रापर्टी खरीदने, लक्जरी कारों की खरीद और चीफ सेक्रेटरी से भी अधिक वेतन पर कंसलटेंट रखने समेत तीन हजार करोड़ के लोन को ठिकाने लगाने का आरोप है। विभाग के सचिव मीनाक्षीसुंदरम की भूमिका पर भी सवाल हैं। मेनका गांधी ने इसकी शिकायत सीएम के साथ ही पीएम से भी की है और इस मामले की सीबीआई जांच की सलाह दी है। आरोपी अविनाश आनंद पिछले सात साल यानी 2013 से बोर्ड में है। इसी तरह से 2013 में पेयजल निगम के एमडी भजन सिंह ने भी नमामि गंगे समेत कई योजनाओं में करोड़ों के व्यारे-न्यारे किये। उसने उत्तराखंड को खूब-लूटा खसोटा। इसके बाद सम्मानजनक तरीके से रिटायर भी हो गया। भजन सिंह के खिलाफ एक दर्जन से भी अधिक गंभीर मामले हैं। जांच-जांच का खेल चल रहा है। और भजन सिंह मजे में पेंशन भी डकार रहा है।

मेरा ये कहना है कि क्या हमने यह राज्य इन भ्रष्ट अफसरों और नेताओं के लिए बनाया है? 550 राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरी मिली। इसके अलावा हजारों आंदोलनकारी आज भी दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। 42 लोगों ने आंदोलन में अपनी जान दे दी। हजारों युवाओं का जीवन बर्बाद हो गया क्योंकि आंदोलन के दौरान उन पर पुलिस केस दर्ज किये गये। कई आज भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। कई आंदोलनकारी कुंठित हो चुके हैं और कई आंदोलनकारी आज भी चंदे या किसी की मदद के सहारे जीवन-यापन कर रहे हैं।

हम चुप रहना सीख गये हैं। हमने मान लिया है कि कुछ नहीं होगा। आम जनमानस की आवाज दबी रहेगी, या सत्ता दबा देगी। पत्रकारों को पांच हजार का विज्ञापन दो, चुप्पी साध लेगा जो नहीं माने उन पर राजद्रोह, रंगदारी जैसे मुकदमे लगा दो। बस सब मैनेज हो गया। पहाड़ियों कब तक चुप रहोगे, जब तुम्हारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, तब? आखिर कब जागोओ?...

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से साभार]

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