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साहित्य

दंगा

March 01, 2020 03:57 PM
दंगा
photo source: Twitter/@AHindinews

बहुत छोटा सा शब्द है दंगा

ठीक
प्रेम की तरह

प्रेम जब-जब
ह्रदय से विद्रोह करता है
तो पैदा होती है
एक टकराहट
एक कड़वापन
एक सूनापन
एक अविश्वास
और
तब ह्रदय
विरानेपन के सफर पर निलकलते हुए
बहशीपन की आगोश में जा बैठता है
तब
समझ की आंखों में
दानवता की धूल बसने लगती है
तब प्रेम बिन ह्रदय
विचलित नहीं होता
बल्कि
अपने अंदर बदहवासी को बसाते हुए
संसार से नफरत करने लगता है

जब कभी
मन की इस चिंगारी को
हवा देने की कोई कोशिश करता है
तब यह ह्रदय
संसार को जलाने के लिए
विचलित हो उठता है

उसकी अपनी सीमा होती है
इसलिए
संसार के क्षितिज को
छूने की चेष्टा किए बिना
वह अपने सामने वालों को
अपने दमन का शिकार बनाना चाहता है

जब
ऐसा ह्रदय
समाज के इर्द गिर्द
प्रेम के ह्रदय से
ओतप्रोत लोगों से
संख्या में बढ़ जाता है
तो
फिर
समाज में फैलने लगती है वैमनष्यता
और
ऐसे लोगों की एकजूटता
संसार को जलाने का मंसूबा प्रदान करती है
और
तब
यही मन की एक चिंगारी
नासमझ बन
समाज के लिए कलंक बन जाती है
और
फिर
कोई एक रात
इतिहास के पन्नों में
मेरठ,
मलियाना,
हाशिमपुरा,
भागलपुर,
गुजरात
और
कई प्रांतों का सफर करते हुए
दिल्ली बन जाती है

कहते हैं दिल्ली
सजग है
यहां के प्रहरी कर्मठ
लेकिन
इस मिथक को राजनेताओं ने तोड़ दिया
दिल्ली ने भी
गुजरात की चार रातों का तोहफा देश को दिया
42 मौत ने इसे भी हाशिमपुरा बना दिया
नालों से निकली लाश ने
इसे भागलपुर बना दिया

दिल्ली
देश की दिल थी
सनकी राजनेताओं ने
देश से दिल को निकाल दिया
दिल्ली
बेदिल हो गई

अब
दिल्ली के दिल में प्रेम को बसाने में
उतना ही वक़्त लगेगा
जितना यमुना के कचरा को साफ करने में
गंगा को निर्मल करने में
सरस्वती नदी को खोज निकालने में
और
उसके अस्तित्व को बहाल करने में

इसलिए
ह्र्दय में प्रेम का वास ज़रूरी है
ह्रदय से प्रेम निकलने से
दंगा का का उदय होता है
दंगा का सूरज अकसर रात में निकलता है
और
दिन को निगल जाता है

इसलिए
देशवासियों प्रेम करो
प्रेम करो, प्रेम करो
यही
तुम्हें जिलाएगा
और
समाज को बनाएगा

छोड़ो नफरत
प्रेम करो, प्रेम करो
देशवासियों प्रेम करो...।

[ए आर आज़ाद]

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