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स्वभाषाओं का स्वागत लेकिन....?

एफ.आई.आर. लाइव डेस्क Updated on Friday, August 06, 2021 20:15 PM IST
स्वभाषाओं का स्वागत लेकिन....?

यह खुश खबर है कि देश के आठ राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कालेजों में अब पढ़ाई का माध्यम उनकी अपनी भाषाएँ होंगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पहली वर्षगांठ पर इस क्रांतिकारी कदम का कौन स्वागत नहीं करेगा? अब बी टेक की परीक्षाओं में छात्रगण हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मलयालम, बांग्ला, असमिया, पंजाबी और उड़िया माध्यम से इंजीनियरी की शिक्षा ले सकेंगे। मातृभाषा के माध्यम का यह शुभ-कार्य यदि 1947 में ही शुरु हो जाता और इसे कानून, गणित, विज्ञान, चिकित्सा आदि सभी पाठ्यक्रमों पर लागू कर दिया जाता तो इन सात दशकों में भारत विश्व की महाशक्ति बन जाता और उसकी संपन्नता यूरोप के बराबर हो जाती।

 

दुनिया का कोई भी शक्तिशाली और संपन्न देश ऐसा नहीं है, जहाँ विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाई होती हो। हिरन पर घांस लादने की मूर्खता सिर्फ भारत-जैसे पूर्व गुलाम देशों में ही होती है। इसके विरुद्ध डॉ. लोहिया ने जो स्वभाषा आंदोलन चलाया था, उसका मूर्त रुप अब देखने में आ रहा है। जब 1965-66 में मैंने इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में अपना पीएच.डी. का शोध ग्रंथ हिंदी में लिखने की मांग की थी तो मुझे निकाल बाहर किया गया था। संसद ठप्प हो गई थी लेकिन उसके 50-55 साल बाद अब क्रांतिकारी कदम उठाने का साहस भाजपा सरकार कर रही है।

 


सरकार में दम और दृष्टि हो तो शिक्षा में से अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई पर कल से ही प्रतिबंध लगाए और देश के हर बच्चे की पढ़ाई उसकी मातृभाषा में ही हो। अंग्रेजी समेत कई अन्य विदेशी भाषाएं स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने की सुविधाएँ विश्वविद्यालय स्तर पर जरुर हों लेकिन यदि शेष सारी पढ़ाई स्वभाषा के माध्यम से होगी तो यह निश्चित जानिए कि नौकरियों में आरक्षण अपने आप अनावश्यक हो जाएगा। गरीबों, ग्रामीणों और पिछड़ों के बच्चे बेहतर सिद्ध होंगे। परीक्षाओं में फेल होनेवालों की संख्या घट जाएगी। कम समय में ज्यादा पढ़ाई होगी। पढ़ाई से मुख मोड़नेवाले छात्रों की संख्या घटेगी।

 

छात्रों की मौलिकता बढ़ेगी। वे नए-नए अनुसंधान जल्दी-जल्दी करेंगे। लेकिन भारत की शिक्षा का स्वभाषाकरण करने के लिए सरकार में अदम्य इच्छा-शक्ति की जरुरत है। रातों-रात दर्जनों पाठ्य-पुस्तकें, संदर्भ-ग्रंथ, शब्द-कोश, प्रशिक्षण शालाएँ आदि तैयार करवाने का जिम्मा शिक्षा मंत्रालय को लेना होगा। स्वभाषा में शिक्षण का यह क्रांतिकारी कार्यक्रम तभी अपनी पूर्णता को प्राप्त करेगा, जब सरकारी नौकरियों से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होगी। क्या किसी नेता या सरकार में दम है, यह कदम उठाने का?

 


यदि आपने संसद में, अदालतों में, सरकारी काम-काज में और नौकरियों में अंग्रेजी को महारानी बनाए रखा तो मातृभाषाओं की हालत नौकरानियों-जैसी ही बनी रहेगी। मातृभाषाओं को आप पढ़ाई का माध्यम जरुर बना देंगे लेकिन उस माध्यम को कौन अपनाना चाहेगा?

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